KCC Institute of Legal and Higher Education, Greater Noida
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भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह देश के आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी विकास की सबसे मजबूत आधारशिला बने। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सामने आए कई घटनाक्रम और सरकारी आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली कई गंभीर और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। ये चुनौतियां क्या हैं?
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पिछले कुछ दिनों से भारत में एजुकेशन सिस्टम में सुधार की बहस तेज हुई है। नीट पेपर लीक मामले के बाद देशभर में जेन–जी द्वारा सरकार विरोधी प्रदर्शन ने शिक्षा व्यवस्था की खामियों की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया है। प्रदर्शन का सरकार पर ऐसा दवाब बना कि शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। क्या शिक्षा मंत्री के इस्तीफा देने से शिक्षा क्षेत्र की सभी समस्याओं का हल हो गया? क्या सिर्फ नीट पेपर लीक ही शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है? भारतीय शिक्षा क्षेत्र बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है जिसके चलते दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश जिसके पास डेमोग्राफिक डिवीडेंड होने की बातें अक्सर कही जाती हैं लेकिन यह बात समझने की आवश्यकता है कि डिवीडेंड के लिए पहले निवेश करने की आवश्यकता होती है। आंकड़ों की जुबानी आइए जानतें हैं कैसी है भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत और तस्वीर बदलने के लिए क्या करना होगा?
हाल के वर्षों में NEET पेपर लीक विवाद ने देशभर में शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी। छात्रों के विरोध प्रदर्शन और उसके बाद हुई राजनीतिक एवं प्रशासनिक हलचल ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बना दिया। हालांकि, क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं केवल परीक्षा प्रणाली और इसमें पारदर्शिता तक सीमित हैं? या इसके पीछे सार्वजनिक निवेश, संस्थागत विस्तार, शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और बढ़ते निजीकरण जैसे कहीं अधिक गहरे मुद्दे मौजूद हैं?
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वास्तविकता यह है कि भारत में उच्च शिक्षा की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा तक समाज के सभी वर्गों की पहुंच आज भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। विश्वविद्यालयों में प्रवेश अब केवल बोर्ड परीक्षाओं के अंकों पर निर्भर नहीं रहा। CUET, JEE और NEET जैसी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाएं उच्च शिक्षा का प्रमुख माध्यम बन चुकी हैं। इसके साथ ही कोचिंग उद्योग का तेजी से विस्तार, प्रमुख सरकारी संस्थानों की बढ़ती फीस, शोध छात्रवृत्तियों में कमी और मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत ने छात्रों और अभिभावकों पर आर्थिक एवं मानसिक दबाव पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है।
दूसरी ओर, सरकारी रिपोर्टें और आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा बजट की वृद्धि की रफ्तार धीमी हुई है। शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय अब भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कोठारी आयोग द्वारा लंबे समय से सुझाए गए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 6 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी नीचे है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का विस्तार अपेक्षाकृत सीमित रहा है, जबकि निजी शिक्षण संस्थानों की संख्या और उच्च शिक्षा में उनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती चली गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि उच्च शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे निजी संस्थानों पर अधिक निर्भर होती जा रही है।
यही नहीं, सरकार के कुल व्यय में शिक्षा की हिस्सेदारी, सरकारी एवं निजी कॉलेजों की बदलती संख्या, उच्च शिक्षा में नामांकन के रुझान, सरकारी स्कूलों के बंद होने की स्थिति, शिक्षकों के रिक्त पद, उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल (Industry Readiness), माध्यमिक शिक्षा में ड्रॉपआउट तथा स्कूल से बाहर रहने वाले किशोरों जैसे कई मुद्दे आज भी गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।
मेडिकल शिक्षा भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। NEET के माध्यम से उपलब्ध सरकारी और निजी MBBS सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई देता है। हाल के वर्षों में घोषित नई मेडिकल सीटों का बड़ा हिस्सा निजी मेडिकल कॉलेजों में है, जहां फीस अधिकांश मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर है।
इस लेख में हम सरकारी रिपोर्टों, आर्थिक सर्वेक्षण, शिक्षा मंत्रालय, UDISE+, AISHE, NITI Aayog तथा अन्य आधिकारिक स्रोतों के आंकड़ों के आधार पर यह समझने की कोशिश करेंगे कि कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था किन प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रही है? इन समस्याओं के पीछे क्या कारण हैं और भविष्य में किन क्षेत्रों में सबसे अधिक सुधार की आवश्यकता है?
यदि आप छात्र, अभिभावक, शिक्षक, शोधार्थी या नीति-निर्माता हैं, तो यह विश्लेषण आपको भारतीय शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों और संभावित समाधान की व्यापक एवं तथ्यपरक समझ प्रदान करेगा। हम लेख के हर बिंदु में एक आंकड़ा देंगे जो बताएगा कि पहले उस विषय पर क्या आंकड़ा था और अब क्या है?
देश में शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए बजट की दरकार होती है। लेकिन हम आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि शिक्षा बजट में वृद्धि लगभग थम गई है। ऐसे देखें तो शिक्षा बजट बढ़ा हुआ लगेगा लेकिन जब आंकड़े के आधार पर विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि जिस रफ्तार से कुल बजट का आकार बढ़ा है, उसके हिसाब से यह वृद्धि पर्याप्त नहीं है। यदि बजट पर्याप्त नहीं मिलेगा तो जाहिर है व्यवस्था में कमी भी होगी।
21% → 7%
भारत के शिक्षा बजट की वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR) में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है।
वित्त वर्ष 2004-05 से 2013-14 के बीच भारत का शिक्षा बजट ₹13,098 करोड़ से बढ़कर ₹71,059 करोड़ हो गया। इस अवधि में शिक्षा बजट की औसत वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR) 21% रही, जो शिक्षा क्षेत्र में तेज निवेश को दर्शाती है।
वित्त वर्ष 2014-15 से 2023-24 के दौरान शिक्षा बजट ₹68,874 करोड़ से बढ़कर ₹1,23,357 करोड़ तक पहुंचा। हालांकि बजट राशि बढ़ी, लेकिन इस अवधि में CAGR घटकर केवल 7% रह गई, जिससे शिक्षा पर सरकारी खर्च की रफ्तार पहले की तुलना में काफी धीमी हो गई।
स्कूली शिक्षा पर खर्च की वृद्धि दर में सबसे अधिक गिरावट देखने को मिली। वर्ष 2004-14 के दौरान इसकी CAGR 22% थी, जो 2014-24 के दौरान घटकर केवल 5% रह गई।
उच्च शिक्षा के बजट में भी वृद्धि की गति कम हुई। 2004-14 के दौरान इसकी CAGR 19% थी, जो 2014-24 में घटकर 10% पर आ गई।
अवधि के अनुसार वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR %)
चार्ट लेबल
स्कूली शिक्षा (2004-14) — 22%
स्कूली शिक्षा (2014-24) — 5%
उच्च शिक्षा (2004-14) — 19%
उच्च शिक्षा (2014-24) — 10%
पिछले दशक की तुलना में हाल के वर्षों में शिक्षा बजट का आकार बढ़ा है, लेकिन उसकी वृद्धि की रफ्तार (Growth Rate) में उल्लेखनीय कमी आई है। इसका सबसे अधिक असर स्कूली शिक्षा पर पड़ा है, जबकि उच्च शिक्षा की वृद्धि भी पहले की तुलना में काफी धीमी हो गई है।
कोठारी आयोग ने सरकार को अपने जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर व्यय करने की सिफारिश की थी लेकिन यह किसी सरकार के लिए प्राथमिकता नहीं रहा। आज शिक्षा पर व्यय 3 प्रतिशत से भी कम है। शिक्षा के लिए कम बजट रखना हमारे राजनीतिक नेतृत्व के शिक्षा की प्राथमिकता और एजेंडे में शिक्षा का महत्व दर्शाता है।
मापदंड 1 – कुल राजस्व व्यय में शिक्षा का हिस्सा
6.98% → 5.39%
ब्याज भुगतान और अनुदान को छोड़कर केंद्र सरकार का कुल राजस्व व्यय लगभग ₹57.95 लाख करोड़ से बढ़कर ₹155.57 लाख करोड़ हो गया।
इसी अवधि में शिक्षा पर राजस्व व्यय अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ा। यह ₹4.05 लाख करोड़ से बढ़कर ₹8.38 लाख करोड़ तक पहुंचा।
परिणामस्वरूप, कुल राजस्व व्यय में शिक्षा का हिस्सा 6.98% से घटकर 5.39% रह गया। अर्थात सरकार का कुल खर्च बढ़ा, लेकिन शिक्षा को मिलने वाला हिस्सा कम होता गया।
मापदंड 2 – जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सार्वजनिक शिक्षा व्यय
वित्त वर्ष 2023-24 में केंद्र और राज्यों का संयुक्त सार्वजनिक शिक्षा व्यय जीडीपी का केवल 2.7% रहा।
यह आंकड़ा कोठारी आयोग (1966) द्वारा सुझाए गए जीडीपी के 6% शिक्षा व्यय के लक्ष्य से काफी कम है। इस लक्ष्य की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भी दोबारा पुष्टि की गई थी।
वर्ष | सार्वजनिक शिक्षा व्यय (GDP%) |
सिफारिश (एनईपी 2020) | 6% |
2019-20 | 3% |
2021-22 | 3% |
2023-24 | 2.7% |
सरकार का कुल राजस्व व्यय लगातार बढ़ा है, लेकिन शिक्षा पर खर्च उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। नतीजतन, कुल सरकारी खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी कम हुई है। वहीं, शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय अभी भी जीडीपी के 6% के लंबे समय से निर्धारित राष्ट्रीय लक्ष्य से काफी नीचे बना हुआ है।
पिछले एक दशक में सरकारी कॉलेजों की संख्या लगभग नहीं बढ़ी, जबकि निजी कॉलेजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। इससे संकेत मिलता है कि देश में उच्च शिक्षा का विस्तार मुख्य रूप से निजी संस्थानों के माध्यम से हुआ है, न कि नए सरकारी कॉलेजों की स्थापना के जरिए। सवाल है कि क्या सरकार की प्राथमिकता निजी संस्थानों के विस्तार पर है? आखिर क्यों सरकारी संस्थानों के विस्तार की पहल नहीं हो रही? नीचे दिए गए आंकड़े देखें तो हमारी बात और स्पष्ट हो जाएगी।
+1% बनाम +49%
2014 से 2024 के बीच कॉलेजों की संख्या में वृद्धि
सरकारी कॉलेजों की संख्या 7,885 से बढ़कर 7,994 हुई। यानी पूरे दशक में सिर्फ 1% की वृद्धि दर्ज की गई।
वहीं निजी (अनुदानरहित) कॉलेजों की संख्या 21,750 से बढ़कर 32,513 हो गई। यह 49% की वृद्धि को दर्शाता है।
यदि निजी सहायता प्राप्त (Private Aided) कॉलेजों को भी शामिल किया जाए, तो निजी क्षेत्र के कॉलेजों की कुल संख्या में लगभग 35% की वृद्धि दर्ज की गई।
जबकि निजी सहायता प्राप्त कॉलेजों की संख्या में लगभग 24% की वृद्धि हुई।
इससे स्पष्ट होता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार की जिम्मेदारी मुख्य रूप से निजी क्षेत्र ने निभाई है। सरकारी कॉलेजों की संख्या लगभग स्थिर रही और जो मामूली वृद्धि हुई, वह भी किसी स्पष्ट सरकारी विस्तार नीति के बजाय सीमित स्तर पर हुई।
श्रेणी | 2014 | 2024 |
सरकारी कॉलेज | 7,885 | 7,994 |
निजी कॉलेज | 21,750 | 32,513 |
ऊपर हमने बताया है कि शिक्षा में निजी संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। देश की जनसंख्या भी बढ़ रही है तो विद्यार्थी निजी कॉलेजों की ओर जाने को मजबूर हुए हैं। पिछले एक दशक में सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी संस्थानों में छात्रों का नामांकन लगभग दोगुनी गति से बढ़ा है। इससे संकेत मिलता है कि उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग को पूरा करने में सरकारी संस्थानों की भूमिका और क्षमता सीमित रही, जिसके कारण अधिक छात्र निजी कॉलेजों का रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
+21% बनाम +96%
2013-14 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षा में नामांकन (Enrollment) की वृद्धि
सरकारी संस्थानों में छात्रों का नामांकन 134 लाख से बढ़कर 163 लाख हुआ। यानी एक दशक में केवल 21% की वृद्धि दर्ज की गई।
इसके विपरीत निजी संस्थानों में नामांकन 182 लाख से बढ़कर 357 लाख हो गया। यह 96% की तेज वृद्धि को दर्शाता है।
वर्ष 2013-14 में भी निजी संस्थानों में छात्रों की संख्या सरकारी संस्थानों से अधिक थी। पिछले दस वर्षों में यह अंतर और बढ़ गया है, जिससे अब उच्च शिक्षा में निजी संस्थान स्पष्ट रूप से प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
सरकारी संस्थानों में सीटों और क्षमता का विस्तार अपेक्षाकृत धीमा रहने के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को निजी कॉलेजों में प्रवेश लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जहां पढ़ाई का खर्च आमतौर पर अधिक होता है।
यह प्रवृत्ति बताती है कि उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग का अधिकांश भार निजी क्षेत्र उठा रहा है, जबकि सरकारी संस्थानों का विस्तार उसी गति से नहीं हो पाया।
उच्च शिक्षा में नामांकन (लाख छात्र)
संस्थान | 2013-14 | 2023-24 |
सरकारी | 134 लाख | 163 लाख |
निजी | 182 लाख | 357 लाख |
पिछले एक दशक में देश में लगभग 89 हजार सरकारी स्कूल कम हो गए। वहीं निजी स्कूलों की संख्या बढ़ती रही। यह दर्शाता है कि स्कूली शिक्षा में सार्वजनिक संस्थानों का दायरा घट रहा है, जबकि निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। यूपी और मध्यप्रदेश में पिछले दिनों सरकारी स्कूल बंद होने की खबर आई तो मीडिया में यह सुर्खियों में छाया रहा। मंत्री अलग–अलग सफाई पेश करते रहे। वे बताते रहे कि इन स्कूलों में बच्चे नहीं है, इसलिए उन्हें मर्ज किया जा रहा है। क्या वजह है कि बच्चों की संख्या कम हो रही है और स्कूल बंद करने की नौबत आ रही है जबकि निजी संस्थान लगातार बढ़ रहे हैं। क्या लोगों का झुकाव अपने बच्चों की शिक्षा के लिए निजी संस्थानों की तरफ बढ़ रहा है, या यह सरकार की ओर से पैदा की गई मजबूरी है? एक बार साेचिए और इन आंकड़ों पर गौर करिए।
~89,000
वर्ष 2014-15 में देश में लगभग 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जो 2023-24 तक घटकर करीब 10.17 लाख रह गए। यानी एक दशक में लगभग 89,000 सरकारी स्कूल कम हो गए, जो करीब 8% की गिरावट है।
यह कमी ऐसे समय में दर्ज की गई, जब इसी अवधि में भारत की आबादी लगभग 12 करोड़ (9.3%) बढ़ी। यानी जनसंख्या बढ़ने के बावजूद सरकारी स्कूलों का नेटवर्क सिकुड़ता गया।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक सरकारी स्कूल बंद हुए। इन दोनों राज्यों में क्रमशः लगभग 30,000 और 25,000 सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी दर्ज की गई, जो कुल गिरावट का बड़ा हिस्सा है।
दूसरी ओर, निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही। इससे संकेत मिलता है कि स्कूल शिक्षा का विस्तार सरकारी संस्थानों की बजाय निजी क्षेत्र में अधिक हुआ।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल स्कूलों के विलय (Merger) या पुनर्गठन का मामला नहीं है, बल्कि देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सरकारी से निजी संस्थानों की ओर बढ़ते झुकाव को भी दर्शाता है।
मुख्य आंकड़े
2014-15
11.07 लाख सरकारी स्कूल
2023-24
10.17 लाख सरकारी स्कूल
बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का दबाव विद्यार्थियों पर हमेशा रहता है। सीबीएसई जैसे बोर्ड में तो यह प्रतिस्पर्धा सबसे अधिक है। लेकिन अब सिर्फ बोर्ड परीक्षा में अच्छा नंबर लाना ही अच्छे संस्थान में आपके एडमिशन की गारंटी नहीं है। विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं ने कोचिंग का एक विस्तृत बाजार तैयार किया है।
पहले अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर मिल जाता था। लेकिन अब केंद्रीय विश्वविद्यालयों और प्रमुख संस्थानों में सीयूईटी (CUET), जेईई (JEE), नीट (NEET) जैसी प्रवेश परीक्षाओं का महत्व लगातार बढ़ गया है।
आज यदि किसी छात्र ने बोर्ड परीक्षा में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए हों, तब भी दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) जैसे संस्थानों में केवल बोर्ड अंकों के आधार पर प्रवेश संभव नहीं है। प्रवेश के लिए CUET में अच्छा प्रदर्शन करना अनिवार्य हो गया है।
लगभग हर प्रमुख प्रवेश परीक्षा के साथ कोचिंग उद्योग की भूमिका भी बढ़ी है। इससे उन छात्रों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलता है, जिनके परिवार महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते हैं।
इस व्यवस्था में सफलता केवल विद्यालयी शिक्षा पर निर्भर नहीं रह गई है, बल्कि अलग से परीक्षा की तैयारी, अतिरिक्त संसाधन और कोचिंग भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
इससे सरकारी और सीमित संसाधनों वाले विद्यालयों के छात्रों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाती है, क्योंकि सभी विद्यार्थियों को समान तैयारी के अवसर उपलब्ध नहीं होते।
प्रवेश प्रक्रिया अब कैसी दिखती है?
बोर्ड परीक्षा का परिणाम
उच्च अंक मिलने पर भी केवल पहला चरण पूरा होता है।
प्रवेश परीक्षा (CUET / JEE / NEET)
कॉलेज में प्रवेश के लिए अब अलग से प्रतिस्पर्धी परीक्षा देनी पड़ती है।
कोचिंग और अतिरिक्त तैयारी
अक्सर यही तय करती है कि छात्र प्रवेश परीक्षा में कितना अच्छा प्रदर्शन करेगा।
कॉलेज में प्रवेश (Seat)
अंतिम प्रवेश अब केवल बोर्ड अंकों पर नहीं, बल्कि प्रवेश परीक्षा के प्रदर्शन और कई मामलों में आर्थिक क्षमता पर भी निर्भर करता है।
उच्च शिक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया पिछले दशक में काफी बदल गई है। अब केवल बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं और उनकी तैयारी निर्णायक भूमिका निभाती हैं, जिससे कोचिंग पर निर्भरता और शैक्षिक असमानता दोनों बढ़ी हैं।
पहले सरकारी संस्थानों में पढ़ाई का खर्च वहनीय था लेकिन अब कम कमाई वाले अभिभावकों के लिए शिक्षा एक महंगी वस्तु हो गई है। प्राइवेट संस्थानों में तो फीस अधिक है ही, सरकारी संस्थानों में भी पिछले एक दशक में फीस दोगुनी से अधिक बढ़ चुकी है।
+122%
आईआईटी (IIT) की ट्यूशन फीस 2014 की तुलना में लगभग 122% बढ़ चुकी है। वर्ष 2016 से केंद्र सरकार द्वारा फीस में बड़े स्तर पर वृद्धि किए जाने के बाद छात्रों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ा है।
आईआईएम अहमदाबाद (IIM Ahmedabad) के प्रमुख दो वर्षीय एमबीए (MBA) कार्यक्रम की फीस भी इसी अवधि में लगभग 66% बढ़ी है। वर्तमान में इस कोर्स की कुल फीस करीब ₹27–28 लाख तक पहुंच चुकी है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) जैसे प्रतिष्ठित सरकारी वित्तपोषित संस्थानों में भी फीस लगभग 2 से 3 गुना तक बढ़ चुकी है।
इन संस्थानों को सार्वजनिक धन (Public Funding) से सहायता मिलने के बावजूद, फीस संरचना धीरे-धीरे 'यूज़र पे' (User Pays) मॉडल की ओर बढ़ती दिखाई देती है, यानी शिक्षा की लागत का बड़ा हिस्सा अब छात्रों और उनके परिवारों को वहन करना पड़ रहा है।
इसका असर यह है कि प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बाद भी कई छात्रों के लिए ऊंची फीस के कारण इन संस्थानों में दाखिला लेना कठिन हो जाता है। आर्थिक क्षमता अब कई मामलों में योग्यता जितनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है।
मुख्य आंकड़े
IIT ट्यूशन फीस
+122%
(2014–2026 के बीच वृद्धि)
IIM अहमदाबाद (2 वर्षीय MBA)
+66%
(2014–2026 के बीच वृद्धि)
NID / NLU फीस
2 से 3 गुना वृद्धि
देश के प्रमुख सरकारी वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में भी पिछले एक दशक में फीस में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि केवल प्रवेश परीक्षा पास कर लेना पर्याप्त नहीं है; उच्च शिक्षा तक पहुंच अब आर्थिक क्षमता पर भी पहले से अधिक निर्भर होती जा रही है।
गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृति बड़ा सहारा होती है। उच्च शिक्षा के लिए तो यह और महत्वपूर्ण हो जाती है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके अवसर भी बड़ी तेजी से कम हाेते जा रहे हैं। विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए शोध छात्रवृत्तियां समाप्त होती जा रही हैं।
भारत एक ओर विदेशों में कार्यरत भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को देश लौटकर शोध करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर विज्ञान के छात्रों के लिए शोध छात्रवृत्तियों (Fellowships) का आधार कमजोर होता जा रहा है।
किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना (KVPY) की शुरुआत 1999 में विज्ञान के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की पहचान कर उन्हें शुरुआती स्तर पर शोध के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी। यह कई वर्षों तक देश की प्रमुख विज्ञान छात्रवृत्ति योजना रही।
वर्ष 2022 में KVPY को एक स्वतंत्र परीक्षा के रूप में समाप्त कर दिया गया और इसे INSPIRE (Innovation in Science Pursuit for Inspired Research) छात्रवृत्ति योजना में समाहित कर दिया गया।
हाल के वर्षों में INSPIRE फेलोशिप को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ी है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान बजट में नई INSPIRE छात्रवृत्तियों के लिए पर्याप्त आवंटन नहीं किया गया, जिससे नए आवेदकों के लिए अवसर सीमित होने की आशंका है।
इसका सबसे अधिक प्रभाव उन स्नातक (Undergraduate) विज्ञान छात्रों पर पड़ सकता है, जो शुरुआती चरण में ही शोध के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं। ऐसे समय में जब भारत वैश्विक स्तर पर अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की बात कर रहा है, शुरुआती शोध प्रोत्साहन योजनाओं का कमजोर होना चिंता का विषय माना जा रहा है।
टाइम लाइन (Timeline)
1999
KVPY की शुरुआत
भारत की प्रमुख विज्ञान प्रतिभा पहचान एवं छात्रवृत्ति योजना के रूप में आरंभ।
2022
KVPY समाप्त
स्वतंत्र परीक्षा बंद कर इसे INSPIRE योजना में शामिल किया गया।
वर्तमान स्थिति
INSPIRE छात्रवृत्तियों पर अनिश्चितता
नई छात्रवृत्तियों के लिए बजटीय आवंटन और भविष्य को लेकर सवाल बने हुए हैं।
विज्ञान के छात्रों के लिए शुरुआती शोध छात्रवृत्तियों की उपलब्धता पहले की तुलना में कम होती दिखाई दे रही है। KVPY के समाप्त होने और INSPIRE फेलोशिप को लेकर बनी अनिश्चितता से यह चिंता बढ़ी है कि शोध के क्षेत्र में आने वाले युवा विद्यार्थियों के लिए शुरुआती अवसर सीमित हो सकते हैं।
अब सबसे चर्चित परीक्षा नीट और पेपर लीक के बाद हुए हंगामे पर आते हैं। नीट परीक्षा के माध्यम से एमबीबीएस की लगभग 1 लाख सीटें है। इसमें से सरकारी कॉलेजों में लगभग 30 हजार सीटें ओपन कैटेगरी में हैं और असली लड़ाई इन्हीं सीटों के लिए है क्योंकि इन सीटों पर फीस व अन्य खर्च कम है बाकि के 70 हजार सीटें प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों मे है जहां की फीस व अन्य खर्च 1 करोड़ रुपए से अधिक हो सकते हैं। नीट परीक्षा में लगभग 20 लाख विद्यार्थी शामिल होते हैं और कम सीटों पर तगड़ी प्रतिस्पर्धा होने से वे दूसरी तरफ पढ़ाई का रुख करते हैं।
~₹1.25 करोड़ खर्च
भारत में एमबीबीएस (MBBS) की कुल सीटें लगभग 1 लाख हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ लगभग 30,000 सीटें ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ओपन कैटेगरी के छात्रों के लिए उपलब्ध होती हैं। वास्तविक प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से इन्हीं सीटों के लिए होती है।
शेष करीब 70,000 सीटें निजी मेडिकल कॉलेजों में हैं, जहां पूरे MBBS कोर्स की फीस और अन्य खर्च मिलाकर लगभग ₹1.25 करोड़ या उससे अधिक तक पहुंच सकते हैं।
निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई का खर्च सरकारी संस्थानों की तुलना में लगभग 5 से 10 गुना अधिक होता है। यही कारण है कि अधिकांश परिवारों के लिए निजी मेडिकल शिक्षा आर्थिक रूप से बहुत कठिन होती है।
ऐसे में NEET परीक्षा पास करना ही पर्याप्त नहीं है। यदि छात्र को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिलती, तो निजी कॉलेज की ऊंची फीस उसके मेडिकल शिक्षा के सपने में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है।
इसलिए NEET की असली चुनौती केवल परीक्षा में अच्छा स्कोर लाना नहीं, बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीमित सीटों में स्थान हासिल करना है।
मुख्य आंकड़े
लगभग 30,000
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की ओपन कैटेगरी सीटें
लगभग 70,000
निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS सीटें
5 से 10 गुना
सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में निजी मेडिकल शिक्षा की लागत
देश में MBBS की अधिकांश सीटें निजी क्षेत्र में हैं, जहां पढ़ाई का खर्च बहुत अधिक है। इसलिए अधिकांश छात्रों के लिए NEET की वास्तविक प्रतिस्पर्धा सीमित सरकारी मेडिकल सीटों के लिए होती है। परीक्षा में सफलता के साथ-साथ आर्थिक क्षमता भी मेडिकल शिक्षा तक पहुंच तय करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन गई है।
केंद्र सरकार ने वर्तमान शैक्षणिक सत्र के लिए नई सीटों की जो घोषणा की है वह अधिकांश निजी कॉलेजों मे है। निजी कॉलेज में फीस व अन्य खर्च वहन करना सामान्यजन की बात नहीं है।
78%
घोषित नई MBBS सीटों में से अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेजों में
केंद्र सरकार ने वर्तमान शैक्षणिक वर्ष के लिए 9,911 नई MBBS सीटों की घोषणा की, जिसे मेडिकल शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक बड़ा कदम बताया गया।
हालांकि, इन 9,911 नई सीटों में से केवल लगभग 2,400 सीटें (करीब 24%) ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जोड़ी गई हैं।
वहीं लगभग 7,511 सीटें (करीब 76–78%) निजी मेडिकल कॉलेजों में हैं। यानी नई सीटों का बड़ा हिस्सा ऐसे संस्थानों में गया है, जहां पढ़ाई का खर्च सरकारी कॉलेजों की तुलना में काफी अधिक होता है।
इसका अर्थ यह है कि मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ने के बावजूद सस्ती और सुलभ मेडिकल शिक्षा की उपलब्धता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
इसलिए केवल नई सीटों की कुल संख्या को देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि मेडिकल शिक्षा सभी छात्रों के लिए अधिक सुलभ हो गई है। महत्वपूर्ण यह भी है कि नई सीटें सरकारी संस्थानों में बढ़ रही हैं या निजी संस्थानों में।
मुख्य आंकड़े
कुल नई MBBS सीटें
9,911
सरकारी मेडिकल कॉलेज
2,400 सीटें (लगभग 24%)
निजी मेडिकल कॉलेज
7,511 सीटें (लगभग 76–78%)
नई MBBS सीटों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेजों में जोड़ी गई हैं। इससे सीटों की उपलब्धता तो बढ़ती है, परंतु कम शुल्क वाली सरकारी मेडिकल शिक्षा का विस्तार अपेक्षाकृत सीमित रहता है। इसलिए मेडिकल शिक्षा तक वास्तविक और किफायती पहुंच बढ़ाने के लिए सरकारी संस्थानों में अधिक सीटों का सृजन महत्वपूर्ण माना जाता है।
हम यहां जो भी चर्चा कर रहे हैं वह सब सरकार के आंकड़ों पर आधारित है। सरकार अपनी रिपोर्ट में इन कमियों को स्वीकार करती है। अब आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की रिपोर्ट के तथ्यों पर गौर करें–
56.2%
केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरों के 56.2% पद रिक्त
31 जनवरी 2025 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर स्तर के 56.2% पद खाली थे।
बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त रहने से शिक्षण, शोध, छात्र मार्गदर्शन और संस्थानों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
75%
उच्च शिक्षण संस्थानों में उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल की कमी
लगभग 75% उच्च शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन यह दर्शाता है कि वे उद्योग (Industry) की अपेक्षाओं के अनुरूप छात्रों को पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पा रहे हैं।
इससे स्नातक छात्रों के लिए रोजगार, इंटर्नशिप और उद्योग से जुड़ाव जैसी चुनौतियां बढ़ जाती हैं।
लगभग 2 करोड़
14–18 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 2 करोड़ किशोर स्कूल से बाहर हैं
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के करीब 2 करोड़ बच्चे और किशोर स्कूल से बाहर हैं।
यह दर्शाता है कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट तथा शिक्षा तक पहुंच की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है।
ये आंकड़े किसी बाहरी संस्था या विपक्ष के नहीं, बल्कि भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में प्रकाशित निष्कर्ष हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षक पदों की कमी, उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल का अभाव और बड़ी संख्या में किशोरों का स्कूल से बाहर होना जैसी चुनौतियां आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने मौजूद हैं।
देश में सरकारों का जोर स्कूलों से ड्रॉपआउट रोकने पर रहा है लेकिन यह कितना कारगर हुआ है? इस पर नजर डालें।
68.5%
माध्यमिक स्तर (कक्षा 9–12) का सकल नामांकन अनुपात (GER), जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2030 का लक्ष्य 100% है
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक माध्यमिक स्तर (कक्षा 9–12) में सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio - GER) 100% तक पहुंचाया जाए, ताकि हर बच्चा माध्यमिक शिक्षा पूरी कर सके।
वर्तमान में माध्यमिक स्तर का GER केवल 68.5% है। इसका अर्थ है कि करीब एक-तिहाई किशोर (लगभग 31.5%) कक्षा 9 से 12 के दौरान स्कूल शिक्षा से बाहर हो जाते हैं या माध्यमिक शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते।
यह वही चरण है, जहां से छात्रों का भविष्य तय होता है। माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा, कौशल विकास और बेहतर रोजगार के अवसर अधिक उपलब्ध होते हैं।
प्राथमिक स्तर पर भारत का सकल नामांकन अनुपात लगभग 91% है, लेकिन माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते इसमें बड़ी गिरावट आ जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चों को स्कूल में बनाए रखना (Retention) अभी भी शिक्षा व्यवस्था की बड़ी चुनौती है।
यदि माध्यमिक स्तर पर नामांकन और विद्यार्थियों को स्कूल में बनाए रखने की दर नहीं बढ़ती, तो NEP 2030 का 100% GER लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।
सकल नामांकन अनुपात (GER %)
स्तर | GER |
प्राथमिक (कक्षा 1–5) | 91% |
माध्यमिक (कक्षा 9–12) | 68.5% |
NEP 2030 लक्ष्य | 100% |
प्राथमिक स्तर पर अधिकांश बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन माध्यमिक शिक्षा तक आते-आते बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ देते हैं। वर्तमान 68.5% GER यह दर्शाता है कि हर तीन में से लगभग एक किशोर 12वीं तक पहुंचने से पहले ही शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाता है। इसलिए माध्यमिक स्तर पर नामांकन बढ़ाना और ड्रॉपआउट रोकना भारत की शिक्षा नीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
जब बच्चा अपना होता है तो शिक्षा प्राथमिकता बन जाती है, लेकिन जब बात समाज के दूसरे बच्चों की होती है, तो शिक्षा पर खर्च सबसे पहले कम किया जाता है।
इस पूरी प्रस्तुति के सभी तथ्य – शिक्षा बजट की धीमी वृद्धि, सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की घटती हिस्सेदारी, बढ़ती फीस, सीमित छात्रवृत्तियां, प्रवेश परीक्षाओं की बढ़ती निर्भरता और निजी संस्थानों का विस्तार – एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं।
देश में सार्वजनिक (सरकारी) शिक्षा व्यवस्था का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो रहा, जबकि शिक्षा की लागत, प्रतिस्पर्धा और प्रवेश की बाधाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
इसका सबसे अधिक प्रभाव उन लाखों छात्रों और परिवारों पर पड़ता है, जिनकी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच सरकारी संस्थानों पर निर्भर है।
यदि भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था, नवाचार, अनुसंधान और कुशल कार्यबल तैयार करना है, तो शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना, सरकारी संस्थानों की क्षमता का विस्तार करना और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।
शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक विकास की सबसे मजबूत नींव है।
यह केवल शिक्षा व्यवस्था की कमियों को गिनाने का विषय नहीं है, बल्कि शिक्षा सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करने का प्रयास है। यदि भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना है, तो शिक्षा को खर्च नहीं, बल्कि भविष्य में किया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण निवेश मानना होगा।
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